मैं कौन हूँ (hindi kavita)

मैं कौन हूँ ? Mai koun hu-Hindi article and poetry

मैं कौन हूँ?…

“ मैं कौन हूँ ? यह प्रश्न जब मेरी अंतरात्मा ने मेरे शरीर से पूछा, तब हँसते हुए उसने प्रतिउत्तर में कहा अरे मैं ठहरा एक निर्जीव शरीर तेरे होने से ही तो मेरा अस्तित्व है,तो भला तेरे अस्तित्व का आधार मुझे कैसे ज्ञात होगा की तू कौन है ?

इसका तात्पर्य यह हुआ की प्रायः हम देखते है की लोगो को अपने शरीर से बहुत प्रेम होता है । और वह आजीवन मात्र अपने शरीर के बाह्य सौंदर्य, रंग-रूप के आधार पर ही यह भ्रमित आकलन कर लेते है, की “मैं कौन हूँ ?

जबकि इसका उत्तर केवल और केवल आपकी अंतरात्मा के पास होता है “आप कौन है”? विडम्बना ये है की इस भाग- दौड़ की जिन्दगी में हम सारी खुशियाँ हासिल कर लेना चाहते है , और इस भ्रम में जीने लगते है स्वयं का अस्तित्व/ पहचान बनाना ही यह सिद्ध कर देता है “आप कौन है”?

पर अंत में हम ये पाते है की सुख सुविधाओ से घिरी वो खुशियाँ भी हमें तृप्त नहीं कर पाती है। अंत में फिर ये सवाल हमारे मन्मस्तिक पर हावी होने लगता  है, की “मैं कौन हूँ” ?

 आखिर ऐसा क्यूँ होता है, शायद इसलिए क्यूंकि आपने दूसरो द्वारा थोपे गये या बताये हुए मार्ग को ही अपनी खुशियों का रास्ता समझ लिया और चल पड़े । क्या एक बार भी आपने स्वयं से पूछा की आपकी खुशियों का वास्तविक समीकरण क्या है ?

या आपको ये भय था की आपके द्वारा चुने गए रास्ते पर कहीं लोग सवाल न खड़े करने लगे, ? मात्र इसीलिये क्यूंकि वो  दुसरो से अलग था ।
परन्तु सच तो ये है स्वयं की आकांक्षाओ और  खुशियों का मार्ग मात्र स्वयं को पता होता है।

मेरा मतलब अगर आपकी स्वयं  की अंतरात्मा को ज्ञात है  की आपकी आन्तरिक प्रसन्नता का मूल रंग क्या है ? तो समझ लीजिये आपने इस प्रश्न को हल कर लिया है की आप वास्तव में कौन है ?

तभी आप एक तृप्तिमय जीवन व्यतीत कर सकते है, अन्यथा जीवन में आप कितनी भी सफलता हासिल कर ले पर आपकी अंतरात्मा सदैव असंतुष्ट और उदास ही रहेगी ।

मैं कौन हूँ?…..

यूँ तो गैरों को  खूब पहचानती हूँ,

पर खुद को ही गैर सी लगती हूँ ।

मै कौन हूँ? है ज्ञात नहीं अबतक ,

क्यूँ स्वयं के लिए ये भरम मैं रखती हूँ

 

चेहरे पर है हिजाबी चेहरे यहाँ अनगिनत बेहिसाब से,

हर दिन बदल लेती हूँ चेहरे मै भी, यहाँ लोगो के हिसाब से..

फिर असली चेहरे को ही अपने मै भूलने लगती हूँ

मै कौन हूँ? है ज्ञात नहीं अबतक ,

क्यूँ स्वयं के लिए ये भरम मैं रखती हूँ

 

कभी आरंभ मै,कभी आगाज हूँ,

हूँ स्वयं ही जिन्दगी या जिन्दगी का राज हूँ

आइने में प्रतिबिम्ब है देह का,

बस रूह के अस्तित्व से ओझल सी लगती हूँ

मै कौन हूँ? है ज्ञात नहीं अबतक

क्यूँ स्वयं के लिए ये भरम मैं रखती हूँ

 

हूँ दुसरो की आस या स्वयं की कर्जदार मैं

हूँ खुशियों का लतीफा तो खुशियों से मोहताज क्यूँ.

क्यूँ जरुरतो में पिसकर सिमटने लगती हूँ

फिर इस व्यस्त सी जिन्दगी में अस्तित्व ढूंढती हूँ

मै कौन हूँ? है ज्ञात नहीं अबतक

क्यूँ स्वयं के लिए ये भरम मैं रखती हूँ...

 

 

http://mankeshabd.com/hindi-poetry-lifes-truth/

http://mankeshabd.com/relations-rishtey-hindi-poetry/

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

About the author

Deepmala Singh

View all posts

4 Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *